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कंप्यूटर पर गेम्स/सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करते समय क्रैक कोड कैसे काम करता है?

पहले एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर एक सॉफ्टवेयर खरीदता है।

उसे घर ले जाने के बाद डिक्रिप्ट करता है (यानी जानने की कोशिश करता है कि उसे बनाया कैसे गया है)।

जब उसके पास पूरा कोड आ जाता है, तो वह उस सॉफ्टवेयर के कुछ कोड या फाइल्स को कट कर लेता है और अपने पास रख लेता है।

जिस कोड या फाइल को अपने पास रखता है उसे हम क्रैक कहते हैं।

अब क्योंकि उसने उस प्रोग्राम से एक हिस्सा निकाल दिया है, इसलिए अब सॉफ्टवेयर काम नहीं कर सकता (सॉफ्टवेयर इंजीनियर चुनकर उसी हिस्से को निकालता है जो जरूरी हो)।
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कंपनियां अक्सर अपने सॉफ्टवेयर को ढूंढने के लिए बीच-बीच में सर्च मारती हैं, कि कहीं इंटरनेट पर किसी ने उनका फर्जी सॉफ्टवेयर तो अपलोड नहीं कर दिया। लेकिन अब अगर कोड ही अलग हो गया, तो वह वही सॉफ्टवेयर नहीं रह जाएगा और इसलिए कंपनियां उसे नहीं ढूंढ पाएंगे। इसीलिए क्रैक बनाया जाता है, ताकि कंपनियां उस सॉफ्टवेयर इंजीनियर को ना पकड़ सके।

और ताकि हम से सॉफ्टवेयर चल सके, इसलिए उस क्रैक को अलग से डाउनलोड के लिए रखा जाता है, ताकि हम उसे सही फोल्डर में डालें (जिसमें से सॉफ्टवेयर इंजिनीयर ने उस फाइल को हटाया था) और हमसे सॉफ्टवेयर चलना शुरू हो जाए।

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